राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डा. मोहन भागवत ने सोमवार को गोरखपुर में भाषाई विवाद पर खुलकर अपने विचार रखे। तीन दिवसीय प्रवास के अंतिम दिन योगिराज बाबा गंभीरनाथ प्रेक्षागृह में आयोजित कुटुंब स्नेह मिलन कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि सभी को घर में अपनी मातृभाषा में बोलना चाहिए। उन्होंने कहा कि जिस प्रांत में रहते हैं, वहां की भाषा को जानना जरूरी है। साथ ही देश के स्तर पर एक भाषा जरूर जानें, यह सबके लिए उपयोगी हो सकती है। इस लाइन के जरिए उन्होंने एक ऐसी भाषा की वकालत की, जिसे देश के हर नागरिक को जानना चाहिए। उन्होंने कहा कि भाषा, भूषा, भवन, भोजन और भजन हमारा अपना होना चाहिए। संघ प्रमुख ने घर में लगाए जाने वाले चित्रों पर भी अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि हमें यह सोचना होगा कि घर में माइकल जैक्शन की तस्वीर क्यों होनी चाहिए और स्वामी विवेकानंद की क्यों नहीं होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि जो हमारे आदर्श हैं, उनकी तस्वीरें घरों में जरूर लगानी चाहिए। उन्होंने कहा कि घर में संस्कार नहीं होंगे तो मतान्तरण होगा। संघ प्रमुख ने कहा कि जहां तक संभव हो, स्वदेशी का प्रयोग करना चाहिए। डा. मोहन भागवत ने कहा कि पर्यावरण की चिंता हमें अपने घर से करनी होगी। इसे हम कर सकते हैं। हमें अलग से कुछ नहीं करना है। पानी बचाओ, प्लास्टिक हटाओ और पेड़ लगाओ। सप्ताह में एक दिन साथ जरूर बैठें परिवार के सदस्य संघ प्रमुख ने कहा कि स्वेदशी अपनाने की बात हो या फिर नियमों का पालन करने की, इसका ज्ञान सभी को होना चाहिए। इसके लिए जरूरी है कि सप्ताह में एक दिन परिवार के साथ जरूरी बैठें। दूध पीते बच्चे से लेकर बड़ों तक इन बातों की चर्चा करनी होगी। आपस में जो सहमति बनती है, उसे अपने व्यवहार में लाना होगा यानी उसका पालन करना होगा। उन्होंने कहा कि हमें समाज के लिए रोज एक अच्छा काम करना चाहिए। क्या कर सकते हैं? इसके बारे में सोचना चाहिए और फिर उसे मूर्त रूप देना चाहिए। उसके बाद व्यक्ति व परिवार के आचरण में यह दिखेगा। इसलिए जरूरी है कि साल में 2 से 3 बार परिवारों का मिलन हो। जिससे समाज में परिवर्तन दिखेगा। परिवार में एक रिश्ता, एक अपनापन होता है सरसंघचालक ने कहा कि एक छत के नीचे चहारदिवारी में एक महिला-पुरुष से परिवार नहीं बनता। परिवार में एक रिश्ता होता है, जिसमें अपनापन होता है। उन्होंने कहा कि बच्चे के जन्म के कुछ क्षण बाद अपनेपन से धीरे-धीरे उसका परिवार के सदस्यों से रिश्ता बन जाता है। अगली पीढ़ी सामाजिक बने, इसके लिए परिवार एक इकाई है। समाज में कैसे रहना है, इसका प्रशिक्षण परिवार में होता है। भारत में परिवार अपनेपन से बनता है, विदेश में सौदा होता है उन्होंने कहा कि भारत में अपनेपन से परिवार बनता है जबकि विदेश में यह सौदा होता है। हमारे यहां बच्चे को अपना परिवार मिलता है जबकि विदेश में ऐसा नहीं है। वहां बड़े होने पर परिवार से मुक्त हो जाते हैं। समाज परिवार के कारण चलता है। पेट भरने का कारण भी परिवार की है। व्यवसाय का आधार परिवार होता है। उत्पादन, पैसे की बचत, राष्ट्र की संपत्ति, सब परिवार में निहित है। परिवार में राष्ट्र का धन भी संचित है। इसका उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि जब पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने लोगों से आह्वान किया था कि वे अपना सोना-चांदी राष्ट्र के लिए दें तो लोगों ने यह दे दिया था। परिवार से सीखते हैं सबके बारे में सोचना संघ प्रमुख ने कहा कि परिवार में अकेले का नहीं बल्कि हम सब का बोध होता है। उसमें केवल अपनी जरूरतों पर विचार नहीं किया जाता। परिवार में सबके बारे में सोचना सिखाया जाता है। उन्होंने कहा कि सामाजिक शिक्षा, आर्थिक गतिविधियों का केंद्र, संस्कृति का पीढ़ी दर पीढ़ी स्थानांतरण का केंद्र परिवार ही है। परिवार का केंद्र माता है। उन्होंने कहा कि परिवार को तैयार करने वाली महिला होती है। इसी से भारत माता का परिचय होता है। हम भारत माता के पुत्र हैं। हमारे देश में महिलाओं को माता मानते हैं डा. मोहन भागवत ने कहा कि हमारे देश में पत्नी को छोड़कर सभी महिलाओं को माता की दृष्टि से देखते हैं। लेकिन विदेश में ऐसा नहीं होता, वहां महिलाओं को पत्नी की दृष्टि से देखते हैं। बाद में जैसा संबंध बना, बन गया। हमारी दृष्टि केवल वैचारिक नहीं है, यह आचार में आए। यह हमारी परंपरा है, जो परिवार से आता है। हमारे यहां व्यक्ति से बड़ा परिवार है। विदेश में व्यक्ति, परिवार से बड़ा होता है। हम विवाह को कर्तव्य मानते हैं, करार नहीं। परिवार का साथ नहीं मिलता तो संघ खड़ा नहीं होता संघ प्रमुख ने कहा कि परिवार का साथ नहीं मिलता हो संघ खड़ा नहीं होता। परिवार का साथ मिलने पर ही कोई भी समाज बड़ा होता है। उन्होंने कहा कि संघ को जानना है तो संघ की शाखा देखिए। संघ का स्वयंसेवक देखिए। उनका परिवार देखएि। हम जो करते हैं, उसे आचरण में लाते हैं। संघ का वर्णन शब्दों में बहुत कठिन है। उन्होंने कहा कि सौदे के आधार पर संसार चल रहा है। यह सोच जब आयी, तबसे समस्याएं आनी शुरू हुई हैं। समाज को बदलना है तो परिवार में परिवर्तन लाना होगा। हमारा परिवार व्रतस्थ होना चाहिए। रोटी, कपड़ा, मकान, स्वास्थ्य, शिक्षा और अतिथि सत्कार, ये परिवार की आवश्यक आवश्यकताएं हैं। यह होना चाहिए। उन्होंने कहा कि वर्ष में 2 से 3 बार छोटे स्तर पर परिवार मिलन कार्यक्रम करें। उन्होंने कह कि छोटे गुटों में मिलना चाहिए, उसमें विचार-विमर्श करना चाहिए। इससे पश्चिमीकरण से आए भ्रम दूर हो जाएंगे। समाज अपना आचरण तब बदलता है जब गृहस्थ के कार्य को देखता है। संघ के स्वयंसेवक को समाज से अवश्य पांच कदम आगे होना चाहिए।'पंच परिवर्तन' भाषण में नहीं रहना है, उसे स्वयं आचरण में लाना है। सभी विषमताओं से ऊपर उठना होगा।। हमारी पहुंच जहां तक है, उसमें जितने प्रकार हैं, उन सबमें हमारा एक मित्र होना चाहिए। मंच पर सरसंघचालक के साथ प्रांत संघचालक डा. महेंद्र अग्रवाल, विभाग संघचालक शेषनाथ उपस्थित रहे। कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्ज्वलन और समापन भारत माता की आरती के साथ हुआ। विभाग कार्यवाह संजय ने अतिथि परिचय करवाया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ गोरखपुर विभाग की ओर से संघ शताब्दी के निमित्त आयोजित इस कुटुंब स्नेह मिलन कार्यक्रम में गोरखपुर महानगर के 20 नगरों,चौरी-चौरा,गोरखपुर ग्रामीण के जिला स्तरीय कार्यकर्ता, नगर- जिला- विभाग- प्रांत कार्यकारिणी,प्रवासी कार्यकर्ता और उनके परिवार के सदस्य सम्मिलित हुए।