बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने यूपी सहित अन्य राज्यों के चुनावों को देखते हुए राष्ट्रीय संगठन के पदाधिकारियों की जिम्मेदारियों में बड़े बदलाव किए हैं। इस बदलाव के बाद भतीजे आकाश आनंद के ससुर एवं पूर्व राज्य सभा सांसद अशोक सिद्धार्थ का कद बढ़ाया है। अब उनके पास राजधानी दिल्ली सहित गुजरात, छत्तीसगढ़ और केरल की जिम्मेदारी सौंपी है। वहीं, पार्टी में कभी ताकतवर मुस्लिम चेहरा रहे नसीमुद्दीन सिद्दीकी के सपा में शामिल होने के बाद मायावती ने पार्टी के मुस्लिम चेहरे नौशाद अली का कद बढ़ाया है। अब उन्हें यूपी के चार मंडलों कानपुर, लखनऊ, आगरा व मेरठ की जिम्मेदारी सौंपी गई है। रामजी गौतम के पर कतरे बसपा प्रमुख के इस फेरबदल के बाद रामजी गौतम के पर कतरे गए हैं। पहले वह नंबर एक पर होते थे। अब ये ओहदा अशोक सिद्धार्थ को सौंपी गई है। रामजी गौतम से दिल्ली, मध्यप्रदेश, झारखंड और बिहार की जिम्मेदारी वापस लेते हुए उन्हें महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश व तमिलनाडु राज्य का प्रभार सौंपा है। इसी तरह राजाराम के पास पहले सिर्फ महाराष्ट्र था। अब उन्हें मध्यप्रदेश, बिहार व झारखंड राज्य का प्रभारी बनाया गया है। पूर्व सांसद गिरीश चंद्र को उत्तराखंड का प्रभारी बनाया गया है। सुमरत सिंह को राजस्थान का प्रभारी नियुक्त किया गया है। यूपी के 18 मंडल प्रभारियों के कार्यक्षेत्र बदले बसपा प्रमुख मायावती ने संगठन को मजबूत करने के उद्देश्य से उत्तर प्रदेश के 18 मंडल प्रभारियों की जिम्मेदारी भी बदली है। नौशाद अली को पार्टी ने मुस्लिम चेहरे के तौर पर आगे बढ़ाया है। उन्हें चार मंडलों की जिम्मेदारी देना इसका संकेत माना जा रहा है। नौशाद अली को जो चार मंडल मिले हैं, वो राजनीतिक रूप से बसपा में काफी अहम माना जाता है। मायावती का यह कदम संगठन में नई ऊर्जा लाने और विभिन्न क्षेत्रों में प्रभाव बढ़ाने की दिशा में उठाया गया है। बसपा सुप्रीमो मायावती ने 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव और अन्य राज्यों में पार्टी की स्थिति मजबूत करने के उद्देश्य से संगठन में ये बदलाव किया है। यह बदलाव पार्टी को जमीनी स्तर पर पुनर्गठित करने और अनुभवी नेताओं को प्रमुख जिम्मेदारियां सौंपने की दिशा में उठाया गया कदम माना जा रहा है। इससे पहले इसी महीने मायावती ने पार्टी में बूथ और सेक्टर स्तर तक पुनर्गठन का फैसला लिया था, जिसमें 50 प्रतिशत युवाओं को मौका देने और कुछ अहम पदों (जैसे दो-दो जिला प्रभारियों) को समाप्त करने का निर्णय लिया था। राजनीतिक विश्लेषक वरिष्ठ पत्रकार सैय्यद कासिम कहते हैं कि मायावती का यह कदम पार्टी में नई ऊर्जा लाने, वफादार कार्यकर्ताओं को प्रोत्साहित करने और 2027 के चुनाव में 'मिशन 2027' को सफल बनाने की रणनीति का हिस्सा है। बसपा अपनी पारंपरिक वोट बैंक दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक को मजबूत करने के साथ-साथ अन्य वर्गों में भी पैठ बनाने की कोशिश में जुटी है। पांच महीने पहले ही अशोक सिद्धार्थ की हुई थी वापसी बसपा प्रमुख मायावती ने 12 फरवरी 2025 को भतीजे आकाश आनंद के ससुर अशोक सिद्धार्थ को पार्टी से निकालाा था। उनके करीबी नितिन सिंह को भी पार्टी से बाहर कर दिया था। यह एक्शन मायावती ने संगठन में गुटबाजी और अनुशासनहीनता पर लिया था। मायावती ने X पर लिखा था- दक्षिणी राज्यों के प्रभारी रहे डॉ. अशोक सिद्धार्थ और नितिन सिंह चेतावनी के बाद भी पार्टी में गुटबाजी कर रहे थे। इन्हें पार्टी विरोधी गतिविधियों में लिप्त होने के चलते तत्काल प्रभाव से पार्टी से निष्कासित किया जाता है। इसके बाद मायावती ने 2 मार्च को पहले भतीजे आकाश का पद छीना और 3 मार्च को पार्टी से बाहर कर दिया था। बाद में माफी मांगने पर 13 अप्रैल 2025 को मायावती ने आकाश को पार्टी में वापस ले लिया था। पर अशोक को इसके छह महीने बाद सितंबर 2025 में ही वापसी हो पाई थी। अब उन्हें राष्ट्रीय पदाधिकारियों में नंबर एक में जगह मिली है। सरकारी नौकरी छोड़कर नेता बने अशोक 5 जनवरी 1965 को जन्मे डॉ अशोक सिद्धार्थ पेशे से डॉक्टर हैं। उन्होंने महारानी लक्ष्मीबाई कॉलेज से नेत्र रोग में डिप्लोमा किया। वह सरकारी सेवा के दौरान बामसेफ में विधानसभा, जिला और मंडल अध्यक्ष पदों पर रह चुके हैं। वह साल 2007 में कन्नौज के गुरसहायगंज प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में तैनाती के दौरान इस्तीफा देकर बसपा में शामिल हो गए थे। बसपा की ओर से वह पहली बार 2009 और दूसरी बार 2016 में एमएलसी रहे हैं। फिर 2016 में राज्यसभा भेजा गया। वह 2022 तक राज्यसभा के सदस्य रहे। बसपा में कानपुर-आगरा जोनल कोऑर्डिनेटर जैसे महत्वपूर्ण पद पर भी रह चुके हैं। राष्ट्रीय सचिव पद के अलावा कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल सहित 5 राज्यों का प्रभार भी संभाला है। वहीं, डॉ सिद्धार्थ की पत्नी सुनीता सिद्धार्थ साल 2007 से लेकर 2012 तक यूपी महिला आयोग की उपाध्यक्ष रह चुकी हैं। अशोक के बारे में दावा किया जाता है कि वह लो-प्रोफाइल रहने वालों में से हैं। वह पार्टी में पर्दे के पीछे रहते हुए काम करते रहे हैं। ---------------- ये खबर भी पढ़ें- BJP ने सपा से दो गुना ज्यादा फॉर्म-6 भरवाए:सियासी दलों ने सिर्फ 1% दावे-आपत्तियां की; 51 लाख वोटर्स ने खुद किया आवेदन विशेष प्रगाढ़ पुनरीक्षण कार्यक्रम (SIR) के तहत अब तक करीब सवा लाख मतदाताओं के नाम काटने के लिए आपत्तियां भारत निर्वाचन आयोग के पास आई हैं। वहीं, नाम जुड़वाने के लिए अब तक 51 लाख लोगों ने आवेदन किया है। समाजवादी पार्टी, भाजपा और चुनाव आयोग पर बड़े पैमाने पर नाम कटवाने के लिए साजिश रचने का लगातार आरोप लगा रही। ऐसे में सवाल उठना वाजिब है कि अब तक भाजपा ने कितने लोगों के नाम जुड़वाने और कटवाने के लिए आवेदन किया? सपा और अन्य राजनीतिक दलों ने कितने आवेदन किए? सपा के आरोपों में कितना दम है? आयोग का क्या कहना है? पढ़िए ये पूरी खबर…