अयोध्या में आयोजित श्रीरामायणवेला प्राण-प्रतिष्ठा महोत्सव के अंतर्गत चतुर्थ दिवस की कथा दिव्य भावनाओं और आध्यात्मिक ऊर्जा से ओतप्रोत रही। राममय वातावरण के बीच श्रद्धालु देर तक श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण के प्रसंगों में डूबे रहे। जगदगुरु रामानुजाचार्य स्वामी रत्नेश प्रपन्नाचार्य ने कहा कि श्रीराम केवल राजधर्म के प्रतीक नहीं, बल्कि गुरुभक्ति, मर्यादा, शौर्य और लोककल्याण के जीवंत आदर्श हैं। चतुर्थ दिवस की कथा श्रद्धालुओं के लिए भक्ति और संस्कारों के पुनर्जागरण का प्रेरणास्रोत सिद्ध हुई। इस अवसर पर श्रीरामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय की गरिमामयी उपस्थिति ने आयोजन की गरिमा बढ़ाई। डॉ. कृष्ण कुमार मिश्र एवं डॉ. कृष्ण कुमार पांडेय की सुसंस्कृत सहभागिता रही, वहीं जगतगुरु कृपालु रामभूषण देवाचार्य के दिव्य सान्निध्य ने कथा को विशिष्ट आध्यात्मिक ऊँचाई प्रदान की। कथा व्यास ने भगवान श्रीराम के बाल्यकाल का अत्यंत मनोहारी चित्रण प्रस्तुत किया। बताया कि अयोध्या के राजमहलों में जन्मे राम केवल राजकुमार नहीं, आदर्श शिष्य भी थे। बाल्यावस्था में ही उन्हें गुरुकुल में विद्याध्ययन हेतु भेजा गया, जहाँ उन्होंने वेद, धनुर्वेद सहित शास्त्र और शस्त्र दोनों में पारंगतता प्राप्त की। गुरु वशिष्ठ के आश्रम में उन्होंने विनय, अनुशासन और ब्रह्मचर्य का अनुपम आदर्श स्थापित किया।आगे वर्णित हुआ कि महर्षि विश्वामित्र अयोध्या आए और यज्ञ की रक्षा के लिए श्रीराम व लक्ष्मण को साथ ले जाने का आग्रह किया। महाराज दशरथ के हृदय में क्षणिक संशय अवश्य उत्पन्न हुआ, किंतु गुरु आज्ञा को सर्वोपरि मानते हुए श्रीराम वनगमन के लिए तत्पर हुए। यह प्रसंग धर्मरक्षा हेतु त्याग और आज्ञापालन की सर्वोच्च परंपरा का संदेश देता है।वन में ताड़का वध, मारीच और सुबाहु का पराभव तथा यज्ञ की सफल रक्षा का प्रसंग सुनाते हुए वक्ताओं ने कहा कि श्रीराम का जीवन शौर्य और करुणा का अद्भुत संतुलन है। जनकपुरी में शिवधनुष भंग कर सीता स्वयंवर की मंगल परिणति का उल्लेख होते ही पंडाल जय श्रीराम के उद्घोष से गुंजायमान हो उठा।