प्रयागराज माघ मेले में शंकराचार्य के शिष्यों-ब्राह्मण बटुकों की शिखा खींचने और यूजीसी संशोधन 2026 के विवाद ने ब्राह्मणों समेत सवर्ण समाज को नाराज कर दिया है। ऐसे में पश्चिम बंगाल के साथ अप्रैल-मई में होने वाले यूपी की 3 सीटों पर उपचुनाव भाजपा और सपा के बीच 2027 के महासंग्राम का सेमीफाइनल बन गए हैं। सहानुभूति की लहर, जातीय समीकरण और सवर्ण वोटरों का बदला मूड… इन तीन सीटों पर जो जीतेगा, वही आगे की राजनीतिक दिशा तय करेगा। क्या यूजीसी विवाद, बटुकों की शिखा खींचने और शंकराचार्य अपमान की आग भाजपा को तीनों सीटों पर परेशान करेगी? या सहानुभूति, जातीय गठजोड़ से बाजी पलट जाएगी? पढ़िए ये रिपोर्ट… विधानसभा ने चुनाव आयोग को भेजी रिक्त सीटों की सूचना यूपी विधानसभा ने चुनाव आयोग को तीनों सीटों की रिक्तता की सूचना भेज दी है। चुनाव आयोग से जल्द उपचुनाव कराने का अनुरोध किया है। संविधान के जानकार कहते हैं कि किसी भी राज्य के आम चुनाव में अगर 6 महीने से ज्यादा का वक्त है, तो उपचुनाव कराना अनिवार्य है। ऐसे में तीनों सीटों पर पश्चिम बंगाल के साथ उपचुनाव की संभावना जताई जा रही है। तीन सीटों में 2 पूर्वांचल और 1 सीट रुहेलखंड में है। पूर्वांचल में 2022 के उपचुनाव में भाजपा को झटका लगा था। इसके बाद घोसी और दुद्धी उपचुनाव में भी उसे हार का सामना करना पड़ा था। घोसी में सपा विधायक के तौर पर जीते दारा सिंह भाजपा में शामिल होकर मंत्री बन गए थे। उन्होंने इस्तीफा देकर उपचुनाव लड़ा, तो सपा से हार गए। इसी तरह दुद्धी में भाजपा विधायक की सदस्यता कोर्ट से सजा के चलते समाप्त हुई थी। यहां भी उपचुनाव में सपा ने भाजपा को हराया था। अब दोनों सीटों पर इसी कार्यकाल में दोबारा उपचुनाव होगा। इस तरह एक ही कार्यकाल में दो बार उपचुनाव का नया रिकॉर्ड भी दोनों सीटों पर बनेगा। घोसी सीट सपा विधायक के निधन से खाली हुई मऊ जिले की घोसी विधानसभा सीट पर सपा के सुधाकर सिंह विधायक थे। उन्होंने ये सीट 2023 में सपा विधायक दारा सिंह चौहान के इस्तीफे के बाद हुए उपचुनाव में जीती थी। बाद में दारा सिंह चौहान सपा छोड़कर भाजपा में शामिल होकर मंत्री बन गए। उनके इस्तीफे के बाद हुए उपचुनाव में सपा के सुधाकर सिंह ने 42 हजार 759 वोटों के भारी अंतर से जीत दर्ज की थी। सुधाकर सिंह के 20 नवंबर, 2025 को निधन के बाद फिर से यह सीट खाली हो चुकी है। कौन हैं दावेदार सपा यहां सहानुभूति बटोरने के लिए घोसी विधायक सुधाकर सिंह के छोटे बेटे सुजीत सिंह का नाम घोषित कर चुकी है। वह घोसी के दो बार ब्लॉक प्रमुख रह चुके हैं। इस सीट पर यादव वोटर्स बड़ी संख्या में हैं। इस कारण पूर्व जिला पंचायत सदस्य विजय यादव और संगठन में लंबे समय से सक्रिय महेंद्र चौहान भी दावेदारी जता रहे हैं। वहीं, भाजपा से पूर्व विधायक विजय राजभर, जिला पंचायत अध्यक्ष मनोज राय और समाजसेवी अजय जायसवाल मुख्य दावेदार हैं। इस सीट पर ओबीसी वोटर निर्णायक हैं। भाजपा विजय के जरिए ओबीसी वोटरों को साधने की जुगत लगाएगी। वहीं, जिला पंचायत अध्यक्ष मनोज राय अपने राजनीतिक रसूख और अजय जायसवाल सामाजिक सरोकारों से जुड़े कार्यों के चलते क्षेत्र में लोकप्रिय हैं। दुद्धी: विजय सिंह गोंड के निधन से दूसरी बार उपचुनाव सोनभद्र की दुद्धी (आरक्षित सीट) से विधायक विजय सिंह गोंड का 8 जनवरी, 2026 को निधन हो गया था। विजय सिंह गोंड (71) आदिवासी राजनीति के दिग्गज थे। 8 बार विधायक बने। 1980 और 1985 में कांग्रेस से जीते। लेकिन 1989 में निर्दलीय लड़े और अपने गुरु रामप्यारे पनिका को हराकर इतिहास रचा। बाद में जनता दल और सपा से जुड़े। 2022 के विधानसभा चुनाव में इस सीट से भाजपा जीती थी, लेकिन विधायक रामदुलार गोंड की रेप केस में सजा से सीट खाली हो गई। 2024 के उपचुनाव में विजय सिंह ने भाजपा के श्रवण गोंड को हराया था। अब उनके निधन से एक ही टर्म में दोबारा उपचुनाव होगा। कौन हैं दावेदार सपा ने दुद्धी सीट पर भी सहानुभूति कार्ड खेलते हुए विजय सिंह गोंड के परिवार को ही टिकट देने का संकेत दिया है। सपा यहां से उनके छोटे बेटे नरेंद्र प्रताप सिंह या मां कृष्णा सिंह को प्रत्याशी बना सकती है। नरेंद्र ने ही पिता विजय गोंड का पूरा मैनेजमेंट उनके रहते संभाल लिया था। वे राजनीतिक रूप से भी सक्रिय हैं। विजय सिंह के 3 बेटों में सबसे बड़े वीरेंद्र प्रताप सिंह सिविल जज हैं। मंझले बेटे सुरेंद्र प्रताप सिंह जल निगम में इंजीनियर की नौकरी छोड़ चुके हैं। अगर उनकी राजनीतिक इच्छा जागृत होती है, तो विवाद टालने के लिए सपा विजय सिंह की पत्नी कृष्णा सिंह को उतार सकती है। इसके अलावा पार्टी में लंबे समय से सक्रिय रहे रामनारायण गोंड भी दावेदारी जता रहे हैं। वहीं, भाजपा उपचुनाव में विजय सिंह गोंड को चुनौती देने वाले श्रवण कुमार पर ही दांव लगाने की तैयारी में है। उनके अलावा जिला पंचायत सदस्य मान सिंह और संगठन में सक्रिय जीत सिंह खरवार भी दावेदारी जता रहे हैं। फरीदपुर: 'चेंज की सीट' पर डॉ. श्याम बिहारी ने तोड़ा था रिकॉर्ड बरेली की फरीदपुर (सुरक्षित) सीट से भाजपा विधायक डॉ. श्याम बिहारी लाल का 2 जनवरी, 2026 को निधन हो गया था। यह सीट 'चेंज की सीट' कही जाती है। इस सीट पर कोई विधायक लगातार 2 बार नहीं जीत पाता था। लेकिन, श्याम बिहारी ने 2017 और 2022 में यह परंपरा तोड़ी। वर्तमान में वे बरेली की महात्मा ज्योतिबा फूले रोहिलखंड यूनिवर्सिटी में प्राचीन इतिहास एवं संस्कृति विभाग के प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष थे। इसके अलावा पांचाल संग्रहालय के निदेशक भी थे और गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय, नोएडा के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स के सदस्य थे। उन्होंने अपने सियासी सफर की शुरुआत ABVP से की थी। उनके निधन से अब इस सीट पर उपचुनाव होगा। कौन हैं दावेदार डॉ. श्याम बिहारी के निधन के अगले ही दिन सीएम योगी परिवार को सांत्वना देने बरेली पहुंचे। डॉ. श्याम बिहारी की पत्नी मंजूलता बेसिक शिक्षा विभाग में टीचर हैं। बड़ी बेटी शिल्पा ग्वाल, कैंटोनमेंट बोर्ड रक्षा में संपदा अधिकारी है। छोटी बेटी शिवानी ग्वाल, मुंबई RBI में कार्यरत हैं। 26 साल का बेटा ईशान ग्वाल दिल्ली में UPSC की तैयारी कर रहा है। पार्टी सहानुभूति बटोरने के लिए पत्नी या बेटे पर दांव खेल सकती है। हालांकि वहां से एबीवीपी के अध्यक्ष जवाहर लाल और पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष रहे संजय सिंह भी दांवा ठोक रहे हैं। जबकि सपा अपने पूर्व विधायक विजय पाल सिंह को फिर से मैदान में उतार सकती है। इसके अलावा सपा से क्षेत्र में सक्रिय रहने वाली कल्पना सागर और शालिनी सिंह भी दावा कर रही हैं। इस भास्कर पोल में हिस्सा लेकर अपनी राय दीजिए… उपचुनाव के रिजल्ट का यूपी की राजनीति पर कितना असर विधानसभा 2027 से पहले प्रदेश में 3 सीटों का उपचुनाव काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। खासकर प्रदेश में शंकराचार्य और चोटी विवाद के साथ यूजीसी मामले से ब्राह्मण और सवर्ण समाज में नाराजगी है। ब्राह्मणों के साथ यूजीसी को लेकर सवर्णों की की कितनी गहरी नाराजगी है, इसके निहितार्थ उपचुनाव के परिणाम से निकाले जाएंगे। वरिष्ठ पत्रकार राजेंद्र कुमार कहते हैं- उपचुनाव पर निश्चित तौर पर इन फैक्टरों का असर दिखेगा। लेकिन, विपक्ष खासकर सपा को तय करना है कि वह इस उपचुनाव में कितना जोर लगाती है? वैसे भी इस तरह के उपचुनाव सत्ता पक्ष और उसकी प्रशासनिक अमले का माना जाता है। अक्सर सरकारें इस तरह के उपचुनाव में अपने प्रत्याशी जिता ले जाती हैं। दूसरा उपचुनाव से आम चुनाव के असर को इस कारण नहीं आंका जा सकता, क्योंकि दोनों की परिस्थतियां अलग होती हैं। बसपा उपचुनाव लड़ती नहीं है। दूसरे विपक्षी दल भी अक्सर चुनाव में या तो उतरते नहीं या कमजोर प्रत्याशी उतार देते हैं। लेकिन, 3 सीटों में दो पर सपा काबिज थी। दोनों सीटें उसने उपचुनाव में एक तरीके से भाजपा से ही छीनी थीं। एसआईआर के बाद इन तीनों सीटों पर उपचुनाव होगा। ऐसे में इसके असर का भी एक अंदाजा होगा। फिर शंकराचार्य और चोटीकांड से ब्राह्मणों की नाराजगी और यूजीसी के चलते सवर्णों की नाराजगी के साथ यूनिवर्सिटी के अंदर मजार खोजे जाने से यूथ भी नाराज है। उपचुनाव के परिणामों में इसका असर जरूर झलकेगा। हालांकि, राजेंद्र कुमार ये भी कहते हैं कि किसी भी प्रदेश का उपचुनाव पूरी तरह से प्रशासनिक तंत्र का माना जाता है। 2024 में प्रदेश में 9 सीटों के उपचुनाव में ये दिख भी चुका है। भाजपा ने कुंदरकी जैसी मुस्लिम बहुल सीट जीत ली थी। जिस सीट पर आजादी से लेकर आज तक भाजपा को उतने वोट नहीं मिले थे, जितने की उसे मार्जिन मिली थी। कुछ इसी तरह की राय वरिष्ठ पत्रकार रामदत्त त्रिपाठी की भी है। वे कहते हैं- वैसे तो इस तरह का उपचुनाव पूरी तरह से रूलिंग पार्टी का होता है। लेकिन, यूजीसी और शंकराचार्य विवाद के चलते अपर कास्ट में एक नाराजगी दिख रही है। वे भले ही विरोध में वोट न करें, लेकिन नाराज होकर घर बैठ सकते हैं। ऐसे में चुनाव परिणाम में जीत-हार के मार्जिन पर असर जरूर पड़ेगा। 18वीं विधानसभा में निधन से 5 उपचुनाव, पांचों पर चला सहानुभूति फैक्टर विधानसभा के मौजूदा कार्यकाल में अब तक आकस्मिक निधन से 8 सीटें रिक्त हो चुकी हैं। पहले रिक्त 5 सीटों पर उपचुनाव हो चुका है। 3 पर अप्रैल-मई में चुनाव हो सकता है। पूर्व की 5 सीटों में से 3 पर भाजपा, 1 पर अपना दल तो 1 पर सपा का कब्जा था। छानबे की सीट अपना दल के विधायक राहुल कोल के निधन से रिक्त हुई थी। अपना दल ने उनकी पत्नी रिंकी कोल को प्रत्याशी बनाया और वह चुनाव जीत गईं। लखनऊ पूर्व से विधायक रहे आशुतोष टंडन के निधन के बाद भाजपा ने उपचुनाव में पार्टी के वरिष्ठ नेता ओपी श्रीवास्तव पर दांव लगाया था, जो सफल रहा। इसी तरह गैंसड़ी सीट से सपा के डॉ. शिव प्रताप यादव के निधन से उपचुनाव हुआ था। तब सपा ने उनके बेटे राकेश यादव को प्रत्याशी बनाया था। राकेश ने सहानुभूति के बलबूते ये सीट जीत ली। मतलब साफ है कि निधन वाली सीटों पर सहानुभूति फैक्टर अधिक चला। अब दोनों ही पार्टी इसी रणनीति पर आगे बढ़ने की जुगत में दिख रही हैं। इसी रणनीति के बलबूते भाजपा ने गोला गोकर्णनाथ सीट जीती थी। भाजपा ने इस सीट से विधायक अरविंद गिरि के निधन के बाद उपचुनाव में पार्टी ने उनके बेटे अमन गिरि को प्रत्याशी बनाया था। ददरौला सीट से भाजपा विधायक रहे मानवेंद्र सिंह के निधन के बाद पार्टी ने यहां से उनके बेटे अरविंद सिंह को प्रत्याशी बनाया था। वे भी जीतने में सफल रहे थे। ----------------------- ये खबर भी पढ़ें- यूपी में अखिलेश का चुनावी कैंपेन संभालेगी PK की कंपनी, दिल्ली-बंगाल में हुई सीक्रेट मीटिंग; 2 मुख्यमंत्रियों की सलाह पर हायर किया यूपी में 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव और CM योगी को टक्कर देने के लिए सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने फिल्डिंग सजा दी है। चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर (PK) की कंपनी I-PAC यूपी में अखिलेश यादव के चुनावी कैंपेन की स्ट्रैटजी बनाएगी। पढ़ें पूरी खबर…