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अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या (28 फरवरी 2026 को अमेरिका-इज़राइल के संयुक्त हमलों में) और मोदी सरकार की प्रतिक्रिया की कमी से जुड़ा है।

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अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या (28 फरवरी 2026 को अमेरिका-इज़राइल के संयुक्त हमलों में) और मोदी सरकार की प्रतिक्रिया की कमी से जुड़ा है।

वास्तविकता यह है कि 28 फरवरी 2026 को इज़राइल (अमेरिकी समर्थन के साथ) ने ईरान पर बड़े पैमाने पर हवाई हमले किए, जिनमें तेहरान में सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत हो गई। ईरानी राज्य मीडिया ने इसकी पुष्टि की, और ईरान ने इसे "आतंकवादी कृत्य" और "सार्वभौमिकता का उल्लंघन" बताया है। ईरान ने जवाबी हमले शुरू किए हैं, जिसमें मिसाइल और ड्रोन शामिल हैं, और क्षेत्रीय अस्थिरता बढ़ गई है।


कांग्रेस प्रवक्ता- पवन खेड़ा का बयान --- 

अयातुल्ला खामेनेई और दूसरे ईरानी नेताओं की सुनियोजित हत्या पर मोदी सरकार की चुप्पी दिखाती है कि इसने नैतिक नेतृत्व का सर्वथा त्याग कर दिया है और इस कृत्य के लिए अमेरिका और इज़राइल की आलोचना करने से घबरा रही है। यह भारत के उन मूल्यों के प्रति विश्वासघात है, जिनके पक्ष में वह हमेशा खड़ा रहा है। इतिहास में भारत कभी इतना कमज़ोर नहीं दिखा था।



मोदी सरकार की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक बयान या निंदा नहीं आई है, जो विपक्ष के लिए बड़ा मुद्दा बन गया है। कांग्रेस, AIMIM (असदुद्दीन ओवैसी), प्रियंका गांधी वाड्रा और अन्य नेताओं ने इसे "नैतिक नेतृत्व का त्याग", "भारत के मूल्यों से विश्वासघात" और "अमेरिका-इज़राइल की आलोचना से डर" बताया है। उन्होंने इसे ईरान के साथ भारत के लंबे संबंधों (ऊर्जा, रणनीतिक साझेदारी) के खिलाफ बताया है, और मांग की है कि सरकार भारतीय नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करे (जो मध्य पूर्व में काम करते हैं)।


यह चुप्पी कई कारणों से हो सकती है:

भारत की विदेश नीति हाल के वर्षों में अमेरिका और इज़राइल के साथ मजबूत हो गई है (रक्षा सौदे, क्वाड, इज़राइल से हथियार आदि)।

ईरान के साथ संबंध भी महत्वपूर्ण हैं (चाबहार पोर्ट, तेल आयात), लेकिन वर्तमान वैश्विक ध्रुवीकरण में संतुलन बनाना चुनौतीपूर्ण है।

सरकार शायद स्थिति का आकलन कर रही है, क्योंकि संघर्ष अभी चल रहा है और CCS (कैबिनेट कमिटी ऑन सिक्योरिटी) की बैठकें हो रही हैं।

"इतिहास में भारत कभी इतना कमज़ोर नहीं दिखा" वाली भावना विपक्ष की ओर से भी दोहराई जा रही है, लेकिन यह व्यक्तिपरक है। भारत ने अतीत में (जैसे 1971, या गुटनिरपेक्ष आंदोलन में) मजबूत नैतिक रुख अपनाया है, लेकिन आज की बहुध्रुवीय दुनिया में व्यावहारिक हितों को प्राथमिकता मिल रही है।

यह घटना मध्य पूर्व को गहरे संकट में डाल सकती है, और भारत के लिए आर्थिक (तेल कीमतें, प्रवासी भारतीय) और सुरक्षा प्रभाव पड़ सकते हैं।

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