यह कहानी सद्दाम हुसैन की फांसी से जुड़ी एक बहुत लोकप्रिय **उर्दू/हिंदी सोशल मीडिया एनकडोट है, जो सालों से व्हाट्सएप, फेसबुक, इंस्टाग्राम और X (ट्विटर) पर वायरल होती रहती है। लोग इसे उनके "शौर्य", "बहादुरी" या "आखिरी पल में भी डर न दिखाने" के प्रतीक के रूप में शेयर करते हैं।
सोशल मीडिया पर वायरल
"जब सद्दाम हुसैन को फांसी के लिए ले जाया जा रहा था, तब अमेरिकी सैनिकों ने उनसे पूछा कि उनकी अंतिम इच्छा क्या है।
सद्दाम हुसैन ने जवाब दिया, "मुझे मेरा कोट दो ताकि मैं उसे पहन सकूं।"
उनकी इच्छा के अनुसार उन्हें एक कोट दिया गया। एक सैनिक आश्चर्यचकित होकर बोला, "आपने कोट क्यों पहना है?"
सद्दाम हुसैन ने जवाब दिया, "आज बहुत ठंड है, कहीं ऐसा न हो कि मेरा शरीर ठंड से कांपने लगे और इराक के लोग यह सोचें कि उनका नेता मौत के डर से कांप रहा है।"
सद्दाम हुसैन इतिहास आपको सदा याद रखेगा।"
लेकिन हकीकत में यह **एक अफवाह या बनाई हुई कहानी (myth/urban legend)** ही लगती है। सद्दाम की फांसी (30 दिसंबर 2006) के बारे में जो आधिकारिक रिपोर्ट्स, गवाहों के बयान, न्यूज़वीक, वाशिंगटन पोस्ट, BBC, और विकिपीडिया जैसी जगहों पर दर्ज हैं, उनमें ऐसा कोई डायलॉग या "कोट मांगने" वाली अंतिम इच्छा का जिक्र नहीं मिलता।
कुछ मुख्य फैक्ट्स जो रिकॉर्ड में हैं:
✓सद्दाम ने फांसी से पहले कुरान पढ़ा, शहादा (ला इलाहा इल्लल्लाह...) दोहराई।
✓उनके आखिरी शब्दों में "मुस्लिम उम्माह जीतेगी" (The Muslim Ummah will be victorious) जैसा कुछ रिपोर्ट किया गया है।
✓उन्होंने हुड (कपड़ा जो चेहरे पर ढकते हैं) पहनने से इनकार किया।
✓मौके पर कुछ लोग नारे लगा रहे थे (मोक्तदा, मोक्तदा...), जिस पर सद्दाम ने तंज भरे लहजे में जवाब दिया था।
✓मौसम ठंडा था, और सद्दाम ने खुद एक लंबा काला कोट, स्कार्फ और टोपी पहनी हुई थी (तस्वीरों और गवाहों के अनुसार), लेकिन यह "डर से कांपने न देने" के लिए मांगा गया था, ऐसा कोई बयान नहीं है।
✓अमेरिकी गार्ड्स या इराकी अधिकारियों से ऐसी कोई "अंतिम इच्छा" वाली बातचीत दर्ज नहीं है।
यह कहानी शायद सद्दाम के मजबूत, निडर इमेज को और मजबूत करने के लिए बाद में गढ़ी गई होगी—जैसे कई ऐतिहासिक/राजनीतिक शख्सियतों के साथ होती है। सद्दाम के समर्थक इसे बहुत पसंद करते हैं, जबकि आलोचक इसे प्रोपगैंडा मानते हैं।
फिर भी, यह एक इमोशनल और प्रभावशाली कहानी है, जो लोगों के दिलों में जगह बना लेती है—चाहे सच हो या नहीं। इतिहास में सद्दाम को अलग-अलग नजरिए से याद किया जाता रहेगा: एक तरफ क्रूर तानाशाह के रूप में, दूसरी तरफ कुछ लोगों के लिए "प्रतिरोध का प्रतीक"।