ईद और अलविदा नमाज़ से पहले शांति समिति की मीटिंग हुई। CO कुलदीप कुमार ने दो मुख्य बातें कहीं:
ईरान-इज़राइल मुद्दे पर: “जिनको ईरान के नाम पर खुजली मची है, उनका इलाज करने की बात...” और कहा कि ऐसे लोग वहाँ जाकर लड़ें, यहाँ माहौल खराब न करें। (मतलब, विदेशी संघर्ष को लेकर स्थानीय प्रदर्शन या तनाव न फैलाएँ।)
सड़क पर नमाज़ पर: “अगर एक भी व्यक्ति सड़क पर नमाज़ पढ़ा तो सीधे केस और जेल।”
ये बयान वायरल हुए और विपक्ष (कांग्रेस, AIMIM आदि) ने “भाषा कठोर, पक्षपाती” कहा।
होली वाली बात
आपने संभल पुलिस कप्तान (SP कृष्ण कुमार बिश्नोई) की अगुवाई में सड़क पर होली खेलने का ज़िक्र किया। वो अलग घटना है—पुलिस वाले त्योहार मना रहे थे, जैसे हर साल कई जगहों पर होता है। उसमें “नमाज़ पर जेल” वाला बयान नहीं था। वो पुराना बयान पिछले CO अनुज चौधरी का था (होली-जुम्मे के समय, मार्च 2025), जिसे बाद में क्लीन चिट मिल गई।
अब सवालों पर सीधा जवाब:
“इज़राइल को फादरलैंड बताने वाले, नेतन्याहू-ट्रंप के नाम पर गालियाँ देने वाले” का इलाज कौन करेगा?
कोई सबूत नहीं मिला कि संभल का CO या कोई पुलिस अधिकारी सोशल मीडिया पर इज़राइल को “फादरलैंड” कह रहा हो या अपने हमवतन को गालियाँ दे रहा हो। ये आपका रिटॉरिकल काउंटर लगता है। अगर कोई नागरिक (चाहे हिंदू या मुस्लिम) सोशल मीडिया पर गालियाँ दे रहा है या विदेशी मुद्दे पर हिंसा भड़का रहा है, तो सभी के लिए कानून समान है—IT Act, IPC के तहत केस हो सकता है। पुलिस को दोनों तरफ कार्रवाई करनी चाहिए, न कि किसी एक पक्ष पर फोकस। लेकिन CO का बयान ईरान समर्थकों को टारगेट कर रहा था क्योंकि मीटिंग में उसी मुद्दे पर चर्चा थी।
सड़क पर नमाज़ पढ़ी तो जेल—क्या वर्दी वाला व्यक्ति ऐसी भाषा बोल सकता है?
हाँ, बोल सकता है और बोलना चाहिए।
संविधान का अनुच्छेद 25: धर्म की स्वतंत्रता देता है, लेकिन सार्वजनिक व्यवस्था (public order), स्वास्थ्य और नैतिकता के अधीन।
सड़क पर नमाज़ = ट्रैफिक ब्लॉक, सार्वजनिक रास्ता अवरुद्ध। सुप्रीम कोर्ट कई बार कह चुका है कि मस्जिद में जगह हो तो सड़क पर नहीं। कई राज्यों में (UP समेत) ये नियम लागू है।
अगर कोई रोड पर नमाज़ पढ़कर ट्रैफिक जाम करे, तो पुलिस का फर्ज है रोकना। “सीधे जेल” वाली भाषा कठोर ज़रूर है, लेकिन कानून-व्यवस्था के लिए डिटरेंस के तौर पर इस्तेमाल होती है। लोकतंत्र में पुलिस “नरम” भाषा बोलकर अपराध नहीं होने दे सकती।
शांति समिति में भाषा अमन-भाईचारे वाली नहीं थी?
मीटिंग का मकसद ही अमन बनाए रखना है। CO ने साफ कहा—विदेशी मुद्दे यहाँ मत लाओ, सड़क पर नमाज़ मत पढ़ो। ये “डंडे” वाली भाषा नहीं, बल्कि स्पष्ट चेतावनी है। अगर भाषा तीखी लगी तो वो अलग बात, लेकिन मकसद कानून लागू करना था। पिछले साल संभल में हिंसा हुई थी, इसलिए एडमिन सतर्क है।
संविधान की प्रस्तावना और मौलिक अधिकार?
बिल्कुल सही। प्रस्तावना में समानता, स्वतंत्रता, भाईचारा है। लेकिन अनुच्छेद 19(2), 25(1) और पुलिस एक्ट साफ कहते हैं—सार्वजनिक व्यवस्था के लिए उचित प्रतिबंध लग सकते हैं। पुलिसिया डंडा अधिकार छीनने के लिए नहीं, बल्कि कानून का पालन कराने के लिए है। कोई भी नागरिक (हिंदू, मुस्लिम, कोई भी) सड़क कब्ज़ा नहीं कर सकता। होली खेलना भी उतना ही अधिकार है जितना नमाज़, लेकिन दोनों को बिना दूसरों को नुकसान पहुँचाए मनाना पड़ता है।
निष्कर्ष
पुलिस का काम पक्षपात नहीं, निष्पक्ष कानून लागू करना है। अगर CO ने कोई गलती की (जैसे पक्षपाती बयान) तो @Uppolice जांच कर सकता है—जैसा पिछले CO के मामले में हुआ और क्लीन चिट मिली। लेकिन सड़क पर नमाज़ रोकना या विदेशी मुद्दे को लोकल न बनाने देना गलत नहीं है। ये “भाईचारा” तभी बनेगा जब सब कानून मानें—न कि सड़क कब्ज़ा करके या विदेशी झगड़े यहाँ लाकर।