आंकड़ों की सच्चाई (सरकारी डेटा से):
राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) के तहत कुल एम्बुलेंस: ठीक 28,830 (दिसंबर 2024 तक संसद में दिए गए जवाब के अनुसार)। इसमें बेसिक लाइफ सपोर्ट (BLS), पेशेंट ट्रांसपोर्ट और एडवांस्ड लाइफ सपोर्ट (ALS) शामिल हैं।
ALS एम्बुलेंस: सिर्फ 3,044 (जून 2024 तक MoHFW प्रेस रिलीज), यानी कुल का करीब 10%। यही वजह है कि ज्यादातर जगहों पर सिर्फ बेसिक सपोर्ट वाली गाड़ी पहुँचती है, जो गंभीर केस में काफी नहीं होती
(नोट: कुल रजिस्टर्ड एम्बुलेंस 1.90 लाख हैं, लेकिन उनमें से ज्यादातर प्राइवेट, हियरस या नॉन-इमरजेंसी हैं। असली इमरजेंसी सर्विस सिर्फ NHM वाली है।)
समस्या कहाँ है?
रिस्पॉन्स टाइम: शहरों में भी 30-60 मिनट, गाँवों में घंटों। ट्रैफिक, ट्रेनिंग की कमी, इक्विपमेंट न होने और डिस्पैच सिस्टम कमजोर होने से।
प्राइवेट एम्बुलेंस: मुँह माँगे दाम (कई बार 20-50 हजार तक), कोई टैरिफ रेगुलेशन नहीं। लोग मजबूरी में भरते हैं।
ट्रेनिंग: 90%+ एम्बुलेंस में ट्रेंड पैरामेडिक नहीं होते।
आपकी माँग (संसद में Swati Maliwal जी ने आज रखी) बिल्कुल सही दिशा में है:
संख्या बढ़ाओ — National Emergency Care Mission की जरूरत है।
प्राइवेट लूट रोकना — फिक्स्ड प्राइसिंग, ट्रांसपेरेंट बिलिंग और रेगुलेशन।
सरकारी ऐप — एक नेशनल ऐप (108 को अपग्रेड करके) जिसमें रियल-टाइम ट्रैकिंग, GPS डिस्पैच, प्राइवेट एम्बुलेंस भी इंटीग्रेट हों। जैसे Uber, लेकिन इमरजेंसी के लिए।
क्यों खाना तो आ जाता है, एम्बुलेंस नहीं?
खाना = प्राइवेट बिजनेस + कॉम्पिटिशन + शहरों में डेंस पॉपुलेशन + GPS ऐप + हजारों राइडर्स।
एम्बुलेंस = पब्लिक गुड + रूरल कवरेज + ट्रेनिंग + महँगा इक्विपमेंट + सरकारी बजट।
लेकिन ये बहाना नहीं बन सकता। कई देशों (जैसे यूके, सिंगापुर) में 10-15 मिनट में ALS एम्बुलेंस पहुँच जाती है। हमें भी चाहिए:
डेडिकेटेड एम्बुलेंस लेन + AI ट्रैफिक सिग्नल
ज्यादा ALS + ट्रेंड स्टाफ
PPP मॉडल (प्राइवेट को रेगुलेट करके शामिल करो)
निष्कर्ष: ये सिर्फ एक MP की माँग नहीं, पूरे देश की जरूरत है। 1.4 अरब लोगों के लिए इतनी कम ALS एम्बुलेंस शर्मनाक है। उम्मीद है सरकार इस पर तुरंत ऐक्शन लेगी — बजट बढ़ाए, रेगुलेशन लाए और एक सिंगल नेशनल ऐप लॉन्च करे।